चेतावनी वीर्यहीनो के लिए!

तु सिंहशावक हिंदबालक! छोड़ अपनी भीरुता ।
पूर्वजों के तुल्य जग में अब दिखा दे वीरता ।।१।।

वीर्य (semen) ही में वीरता है, वीर्य धारण अब करो ।
आर्यमाता दास्य में है दुःख उसका तुम हरो ।।२।।

प्राणधारणा कर रही बाट अपनी ढुंढ रही।
हाय! तौ भी हिंदजनता विषयसुखमें सो रही ।।३।।

घोर निद्रा छोड़ करके जग उठो अब एकदम।
आर्यपूत्रो! शीघ्रता से अब बढ़ओ निज कदम ।।४।।

दासता से मृत्यु अच्छी, दीनता को फेंक दो।
राज्य अपना आत्म बल से प्राप्त कर दिखलाय दो ।।५।।

वीर्यही में वीरता है! बाहुबल है!! राज्य है!!!
आत्मबल में मुक्तता है! और मारगत्याज्य है।।६।।

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बहुत ख़ूब, भाई। अति प्रेरणादायक कविता है!

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चेत जाओ मेरे प्यारे भाइयों।।

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